हार-जीत से बड़ा है सक्षम बनना
अमिताभ स.
'सफलता और असफलता में से किसी एक का पलड़ा भारी नहीं है, क्योंकि सीखते हम दोनों से हैं।Ó कहना है, इसरो के पूर्व प्रमुख व जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. के. सिवन का। सच है कि जीत या सफलता एक मन:स्थिति है। लेकिन कुछ हासिल करना या किसी को परास्त करना, वास्तव में जीत कहां है? आप जैसे हैं, वैसे ही खुश हैं, यह सफलता के असल मायने हैं। बस खेलते रहना जीत से कम बड़ी बात नहीं है। जीतने या हारने से ज्यादा अहमियत सक्षम बनने की है। सयाने बताते हैं कि जिंदगी जीने की जो सीख खेल-खेल में मिलती है, वह किसी से नहीं मिलती। सुबह की सैर और जिम में कसरत सेहत जरूर दुरुस्त रखते हैं, लेकिन खेलों जैसा चौतरफा व्यक्तित्व निखार नहीं ला पाते। हारना सिखाना ही खेलों की बड़ी खूबी है। जबकि कोई हारना नहीं चाहता, न ही किसी को हारना आता है। स्कूली और गली-मोहल्लों के खेलों में तो बचपन ही गुजरता है कि हारते जाओ, फिर भी खेलते जाओ। कोई कितना हारे, खेलने के मौके कम नहीं होते। खेलों की भांति जिंदगी में भी तमाम चुनौतियों से दो-चार होना पड़ता है- कुछ जीतते हैं, कुछ हारते हैं। जाने-माने उद्योगपति अज़ीम प्रेमजी बताते हैं, 'कोई सौ में से सौ दांव नहीं जीतता है। अपनी हार को भी सामान्य तौर पर लीजिए। हार के लिए खुद को सज़ा मत दीजिए। हार मानिए, अपने हिस्से की समस्या से सीखें और आगे बढि़ए।Ó और फिर, जीतने का इतना महत्व नहीं होता, जितना जीतने के लिए प्रयास करने का होता है।एक दौड़ प्रतियोगिता में केन्या का एथलीट हाबिल मुताई भाषा की दिक्कत की वजह से 'दौड़ पूरी हो गईÓ लिखे मार्क को समापन बिंदु मान कर फिनिश लाइन से कुछ फुट पहले रुक गया। उसके पीछे आ रहे स्पेनिश एथलीट इवान फर्नांडीज ने चिल्लाकर उसे रेस जारी रखने को कहा। लेकिन मुताई को स्पेनिश में कहा समझ नहीं आया। स्पेनिश एथलीट ने आव देखा न ताव, उसे जीतने के लिए इतनी जोर से धक्का दे मारा, ताकि वह फिनिश लाइन पार कर जाए। ऐसा करके इवान खुद हार कर भी जीत गया। ज़ाहिर होता है कि जीतने की इच्छा रखना, लेकिन जरूरत पड़े, तो हारने के लिए तैयार रहना, अपनी जीत और हार को शालीनता से सम्भालना- यही खूबियां हैं, जो खेल से किसी इंसान के अंदर आती हैं, आनी चाहिए। सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, 'जो हमारे साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, वे हमारे दुश्मन नहीं होते। ये लोग हमें खुद की कमियों को याद दिलाते रहते हैं। साथ ही, हमारी गुणवत्ता को कायम रखते हैं।Ó हर मैच को जीतना सही गोल या लक्ष्य नहीं होना चाहिए। हर खेल जीतना ही मकसद होगा, तो हार से आत्मविश्वास डगमगा जाएगा। इसलिए बेहतरीन खेलना ही हर खिलाड़ी का मकसद होता है। तय है कि खेल-खेल कर सीखने वाला कभी नहीं हारता।
जि़ंदगी के भी हर मोर्चे पर बेशक हारते जाएं, लेकिन मन से कभी नहीं हारना चाहिए। और अगर कोई विजेता बनना चाहे, तो उसे पहले विनम्र, प्रेममय, शांतिमय और आनंदमय इंसान बनना होगा। शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद इस हद तक लिखते हैं, 'जीतना आसान है। कठिन तो उसके बाद का दौर है। हार प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। जीत इस राह पर चलने की प्रेरणा दे ही नहीं सकती। हरेक का हर परफ़ॉर्मेंस जीत-हार और सफलता- असफलता के दो स्तम्भों के बीच झूलता है।Ó खोने और पाने का सिलसिला हरेक के साथ ताउम्र जारी रहना चाहिए। आप कर सकते हैं, मन में यह विश्वास हो, तो आधी जीत मिल जाती है।
इसीलिए माना जाता है कि जिंदगी किसी खेल या परीक्षा की तरह जोखिम से भरी है। कोई इसे पहेली कहता है, कोई इम्तिहान, तो कोई मौका। जो बीत गया, उसे हरगिज दुरुस्त नहीं किया जा सकता, लेकिन आने वाले दौर का निर्माण किया जा सकता है। हार या फेल का रोना भूल कर और खुद पर यकीन कर हर इंसान अपने लक्ष्य के काफी समीप पहुंच सकता है। क्योंकि हर इंसान अपनी किस्मत खुद रचता है। जब किस्मत रचने में असफल होता है, तब वह नियति बन जाती है। जाने-माने कार उत्पादक हेनरी फोर्ड ने एक दफा कहा था, 'सफल शख्स का राज़ यही है कि वह अपनी मंजिल पाने के लिए क्या जरूरी है, यह जान जाता है और उस पर अमल करता है।Ó
बचपन में स्कूली पाठ्य पुस्तक में पढ़ी कथाकार सुदर्शन की कालजयी कहानी 'हार की जीतÓ जीवन भर याद रहती है। कहानी संदेश देती है कि मन छोटा किए बगैर मेहनत और साफ़ नीयत की बदौलत हार भी जीत में तब्दील हो सकती है। बड़े कमाल की बात है कि ऑस्ट्रेलिया की सेना की कोर टीम में भर्ती के लिए विजेताओं की बजाय हारे फ़ौजियों को प्राथमिकता दी जाती है। आविष्कारक थॉमस एडिसन की राय में, 'कतई मत कहिए कि मैं 99 दफा हारा हूं। बल्कि कहें कि मैंने हारने की 99 वजहें ढूंढ़ी हैं।Ó और फिर उन्हीं वजहों को पार करते-करते जीत की राह खुलती है। उधर उद्योगपति रतन टाटा भी मानते हैं कि तुम्हारी नाकामी सिर्फ तुम्हारी है, तुम्हारी पराजय सिर्फ तुम्हारी है। किसी को दोष देने की बजाय, गलती से सीखो और आगे बढ़ते जाओ।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्द यही संदेश देते हैं- छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता। निरंतर थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ते रहना ही जीत समझिए।
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