मुंशी प्रेमचन्द की 141वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए की भवभीनी श्रद्धांजलि अर्पित
उदय त्यागी
गोरखपर,31 जुलाई (वार्ता) प्रख्यात साहित्यकार एवं कथाकर मुंशी प्रेमचन्द की 141वीं जयंती पर आज यहां विभिन्न संस्थानों ने कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें याद करते हुए भवभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
मुख्यरूप से भारतीय जन नाटय संघ ..इप्टा.. , प्रेम चन्द सहित्य संस्थन और अन्य संगठनों की ओर से उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण करके उन्हें भवभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।इस अवसर पर प्रेम चन्द साहित्य संस्थान की ओर से एक संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया ,जिसमें वक्ताओं ने श्री प्रेम चन्द की रचनाओं की प्रासांगिकता को कालजेयी बताते हुए उनकी सामाजिक अन्र्तविरोधों की परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त की।
इप्टा के रंगकर्मियों द्वारा प्रेम चन्द की कहानी ..टुराशा.. का पाठ भी किया। इसके अलवा प्रेम चन्द की जयंती पर ..प्रेमचन्द और हमारा समय..विषय पर संगोष्ठी के अलवा प्रेमंचद की विरासत विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया।
वक्ताओं ने प्रेमचन्द पार्क में स्थित उनके जर्जर भवन को पुर्ननिर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य रूप से दो दशकों से भी अधिक समय से मुंशी प्रेमचन्द की जयंती पर इप्टा उनकी कहानियों का नाटय स्पान्तरण का मंचन करता आ हा है। इसी क्रम में आज प्रेमचन्द की कहानी ..रंगीले बाबू..की नाटय प्रस्तुत की गयी। इस अवसर पर नाटय मंचन के दौरान कयी प्रमुख साहित्यकार एवं रंगमर्कीमौजूद थे।
प्रेमचन्द जी जहां निवास करते थे वह स्थान अब उनके नाम से पार्क बन गया है। यहां पर उनकी पुण्य तिथि और जयंती पर साहित्यकारों द्वारा विभिन्न तरह के आयोजन करके उन्हें याद किया जाता है।
गोरखपुर छोड़े श्री प्रेमचन्द को भले ही एक सदी बीत गयी, लेकिन उनके उपन्यास और कहानियों में जिस गोरखपुर की झलक आती है वह आज भी कहीं न कहीं इस क्षेत्र में मौजूद है ।
मुशी प्रेमचन्द जमीन से जुड़े साहित्यकार थे । उन्होंने अपने लेखन कार्य के दूसरे पड़ाव की अधिकतर कहानियां गोरखपुर में लिखी और यहीं से उनका आदर्शवाद यथार्थवाद में बदल गया ,इसीलिए इस क्षेत्र से उनका जुड़ाव महत्वपूर्ण माना जाता है। मुंशी प्रेमचन्द अपने बाल्यजीवन में पिता के साथ गोरखपुर और बस्ती में रहे तथा फिर उन्होंने कहानी लेखन की शुरूआत भी यहीं से की। उन्होंने कहानियों में रूढ़िवादिता को समाप्त कर उसे बागी तेवर दिया। वह अपनी अंतिम कहानी कसन को जहां छोडा था वहीं से फिर प्रगतिशील आन्दोलन का आरम्भ होता है।
उन्होंने बहुत से उपन्यास रंगभूमि, सेवा सदन और प्रेम आश्रय आदि कहानियां गोरखपुर में लिखी इसीलिए उनका इस क्षेत्र से विशेष जुडाव था।वर्ष 1936 में उनके निधन के बाद इस अंचल में मौजूद गरीबी, पिछड़ापन और किसानों एवं नौजवानों की समस्याओं को साहित्य में मुखर करने वाला कोई दूसरा साहित्यकार उनके जैसा पैदा नहीं हुआ।
प्रेमचन्द जी के उपन्यासों में वरदान प्रतिज्ञा, सेवा सदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रगभूमि कर्मभूमि, गोदान, मनोरमा और
कहानियों में उनके कुल 21 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिसमें 300 से अधिक कहानियां समाहित रही। प्रमुख कहानी संग्रहों में सोजे वतन, सप्त सरोज, नमक का दरोगा, प्रेम पचीसी, प्रेम प्रसून,प्रेम द्वेासी, प्रेत प्रतिमा, प्रम तिथि, प्रम चतुर्थी, सप्त सुमन, प्रेम प्रतिज्ञा, प्रेम पंचती, प्रेरणा, समर यात्रा और नवजीवन आदि शामलि है। इसके अलावा नाटक में संग्राम, कर्थला, प्रेम की वेदी तथा जीवनियों में महात्मा शेख सादी, दुर्गादास, कलम,तलवार और त्याग शामिल है।
कथा सम्राट प्रेमचन्द पर जितना अधिकार बनारस का है उतना ही गोरखपुर का भी है। ऐसा इसलिए कि दो चरणों में अपने गोरखपुर प्रवास के दौान वह पढ़ा और पढ़ाया भी। अगर यह कहा जाय कि वर्ष 1892 से चार वर्ष के पहले यहां प्रवास के दौरान ही इस महान कलाकार के कथा साहित्य की नींव पडी तो गलत नहीं होगा। इसका पुख्ता प्रमाण प्रेमचंद जी की पहली कहानी ..मेरी पहली रचनाकृत है, जिसे उन्होंने अपने मामा के चरित्र को ध्यान में रखकर यहीं लिखी।
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