कहावत भी हैं कि जिसकी लाठी उसकी भैस ......

 


कुशीनगर। प्रजातन्त्र में संख्या बल का बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, कहावत भी हैं कि जिसकी लाठी उसकी भैस ......
यही कहावत आजकल विपणन विभाग पर चरितार्थ हो रही हैं लेकिन इनकी तो कोई सुनने वाला ही नही है क्यो कि जनतंत्र के हिसाब से इनकी संख्या कम है।
     तमकुहीराज तहसील क्षेत्र में सेवरही, दुदही व तमकुही विपणन विभाग के गोदामो से कोटेदारो को राशन की आपूर्ति होती है, फिर दुकानदार गरीबो में राशन का वितरण करते हैं। एसडीएम की ओर से कोटेदारो के विरुद्द हुई ताबड़तोड़ कार्रवाइयों से राशन दुकानदारो ने राशन की घटतौली का आरोप तौल केंद्र पर लगा अपने बचने का मार्ग तलाश लिया और प्रशासन को ही कटघरे में लाने की कवायद शुरू कर दी है। इनकी भी बात जायज हैं कि जब तौल में कम राशन मिल रहा है तो फिर शत प्रतिशत वितरण कैसे हो पायेगा। अब इनके पास तो संख्या बल है फिर इन्होंने तो ऊपर से कम राशन मिलने की बात कर अपने बचने का रास्ता तलाश लिया। अब लोगो की नजर विपणन गोदामो पर आकर टिक गई, तो जब ऊपर से  झोल ही झोल हैं तो फिर जिम्मेदार शतप्रतिशत आपूर्ति कहा से सुनिश्चित करे, यह एक सवाल है, लेकिन इनकी कोई सुनने वाला ही नही है क्यो कि इनकी संख्या कम है और प्रजातन्त्र में  संख्या बल का अहम स्थान है। दूसरी बात कि लाकडाउन के चलते तीन माह का राशन एक साथ ही विभाग को उपलब्ध कराया गया है। अब सवाल कि उस राशन को रखने के लिए गोदामो में जगह ही नही है फिर जिम्मेदार राशन के रखरखाव की व्यवस्था कैसे करे। ऊपर से गेहूं की खरीददारी भी शूरू हो चुकी है फिर सवाल उठ रहा है कि जब कोटे की दुकानों के मिले राशन रखने की पर्याप्त व्यवस्था नही है तो फिर क्रय होने वाले गेहूं का रखरखाव की व्यवस्था रामभरोसे ही है। विपणन गोदामो पर आजकल वर्तमान सीजन का ही नया चावल आपूर्ति हो रही हैं जिसमे नमी हैं। कुछ दिनों रखने के बाद उक्त चावल की आर्द्रता में कमी आने पर वजन का कम होना लाजिमी हैं। फिर कम हुए राशन की आपूर्ति विभागीय जिम्मेदार कहा से करेंगे, इसकी भी कोई मुकम्मल व्यवस्था नही है। पंजाब हरियाणा से आने वाले गेहू के बोरो की स्थिति सही नही रह जाती हैं, फ़टे हुए बोरो के चलते गोदाम में रखवाते और कोटेदारो को गोदाम से निकालकर देने के समय काफी अनाज गिरकर नष्ट हो जाते हैं, ऊपर से चूहों की कतरन से होने वाले नुकसान अलग ही है। अब नष्ट हुए राशन की आपूर्ति जिम्मेदार कहा से करेंगे, इसकी कोई व्यवस्था नही है। *अब इनकी कोई सुनने वाला ही नही है क्यो कि प्रजातंत्र के लिहाज से इनकी संख्या कम है। काश कोई इनकी भी सुनता ..............?*


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