मिथिला में शोध की प्राचीन परम्परा, ज्ञानियों की है धरा : रामाशीष


दरभंगा, 19 फरवरी (वार्ता) सामाजिक चिंतक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक की संस्था प्रज्ञा प्रवाह के उत्तर भारत के संयोजक रामाशीष ने मिथिला को शोध की भूमि बताया और कहा कि इस भूमि में हमेशा से शोध की प्राचीन परंपरा रही है, इसलिए यह ज्ञानियों की धरा कहलाती है।
श्री रामाशीष ने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (नई दिल्ली) एवं ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के तत्वावधान में आयोजित ‘शोध के विभिन्न आयाम’ विषयक कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि राजा जनक के दरबार में अष्टावक्र-आचार्य बंदी का संवाद हो या फिर याज्ञवल्क-गार्गी का शास्त्रार्थ। सब में शोध के सूत्र निहित है। मिथिला में आत्मिक प्रेम को महत्व दिया गया है। यहां की संस्कृति अद्वितीय है, पश्चिम से तो बिल्कुल अलग है। इसलिए यहां होने वाले शोध को यहीं की दृष्टि से देखा जाना चाहिए, न कि पश्चिम के चश्मे से। शोध की पद्धति के साथ दृष्टि भी जागृत होनी चाहिए तभी शोध संभव हो सकता है।
श्री रामाशीष ने कहा कि जिन लोगों ने मनु को नहीं पढ़ा, इसके बावजूद मनु पर अनर्गल टिप्पणी करते हैं। जबतक पाश्चात्य के चश्में से भारत को देखते रहेंगे, हम अपने स्वर्णिम इतिहास को ढ़कते रहेंगे। मनु ने अपने लेखनी में भारत में वर्ण व्यवस्था को लिखा है और यह शोध का विषय है कि संविधान में इतने जातियों का उल्लेख कैसे हो गया। भारत को भारत की दृष्टिकोण से जानने की जरूरत है। विचार की प्रक्रिया स्थिर नहीं होनी चाहिए। यदि विचार स्थिर होता है तो विकास बाधित हो जायेगा। पूरे इतिहास को पाश्चात्य के लोगों ने भारत के सामने तोड़-मरोड़ कर रख दिया और हम पीढ़ी दर पीढ़ी पाश्चात्य लेखन को ही पढ़ते रहें और तरजीह देते रहें।
सामाजिक चिंतक ने कहा कि गांव-शहर, लोगों के बीच जाकर अध्ययन करने से ही शोध की सार्थकता नजर आती है। बिना जनता के बीच गये और अनुभव प्राप्त किये शोध नहीं कर सकते हैं। विशेष कर आंकड़ों का निर्धारण तो कतई नहीं किया जा सकता है। प्राचीन मिथिला में ऐसे ही शोध हुए हैं और इसी से यहां के ज्ञानियों ने देश के पुरूषार्थ को विश्व भर में स्थापित किया है।



 


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