वेदवाणी

इन्द्रमिद्धरीवहतोऽप्रतिधृष्टशवसं।
 ऋषीणां सुष्टुतीरुप यज्ञं च मानुषाणां।। ऋग्वेद १-८४-२।।
भावार्थ-
ईश्वर उन लोगों के मन और बुद्धि को पवित्र करें, जो उसकी उपासना करते हैं, और जनहित के कार्य करते हैं।  जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करने का प्रयास करते हैं, ज्ञानेंद्रियों को निरंतर ज्ञान प्राप्ति में लगाते हैं, और कर्मेंद्रियों से मानव हित कार्य  करते हैं।
काव्यार्थ-
जो जन करते प्रभु उपासना,
जनहित परोपकार के कार्य।
होता तन मन बुद्धि पावन,
कृपापात्र वे ही कर्त्तार।
इंद्रियजीत होने जो बढ़ते,
उनकी इन्द्रियाँ होतीं सफल।
ज्ञानेन्द्रिय से ज्ञान बढाते,
कर्मेन्द्रिय से कर्म विमल।
ऐसे इद्रियजय व्यक्ति ही,
जनहित कार्यों को कर पाते।
त्याग तपस्या सेवा समर्पण,
प्रभु भक्ति कर प्रभु को रिझाते।।
   वास्तव में
ईश्वर भक्त की पहली शर्त ही यह है, व्यक्ति ईश्वरीय आज्ञा में  इंद्रियजित्त-बलशाली हो ईश्वर पुत्रों को सुख पहुंचाता हुआ निरन्तर ईश्वर की ओर बढ़ता रहे। बली तो रावण भी था विभीषण भी।
परन्तु श्री राम की शरण विभीषण को ही प्राप्त हुई।


आचार्या विमलेश बंसल आर्या,
329, द्वितीय तल संतनगर पूर्वी कैलाश नई दिल्ली-65
-8130586002


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

खुशहाली की राहें

सपा अध्यक्ष को लगता है कि मुसलमान उनकी जेब में हैं: मायावती

हार-जीत से बड़ा है सक्षम बनना